जो तुम्हारे हाथ में नहीं है उसे भगवान पर छोड़ दो।

जो लोग ज्यादा सोचते हैं उन्हें एक कहानी सुनाता हूं। यह कहानी पूरा सुन लिए तो चिंता करना छोड़ दोगे तो सुनो। एक छोटे से गांव में भगत नाम का व्यक्ति रहता था। भगत बहुत मेहनती था। लेकिन उसकी एक आदत उसकी शांति छीन चुकी थी। बेहद चिंता करना। सुबह उठते ही वह सोचता कल क्या होगा? पैसा रहेगा या नहीं? लोग क्या कहेंगे? परिवार सुरक्षित रहेगा या नहीं? रात को सोने जाता तब भी उसका दिमाग रुका नहीं करता।
एक दिन अत्यधिक चिंता के कारण उसकी तबीयत बिगड़ गई। गांव के लोग उसे पास के पहाड़ पर रहने वाले एक संत के पास ले गए। संत बहुत सरल जीवन जीते थे। ना ज्यादा बोलना ना ज्यादा सोचना। भगत ने संत से कहा महाराज मेरा मन कभी शांत नहीं होता। मैं हर समय डर और चिंता में रहता हूं। संत मुस्कुराए और पास रखी एक मिट्टी की मटकी उठाई। उन्होंने कहा इस मटकी को पानी से भर दो। भगत ने मटकी भर दी।
फिर संत बोले अब इसे सिर पर रखो और चलो। लेकिन एक शर्त है अगर एक बूंद भी गिरी तो तुम असफल हो जाओगे। भगत पूरी तरह मटकी पर ध्यान लगाकर चलने लगा। रास्ते में लोग उससे बातें करते रहे। आवाजें आती रही। लेकिन भगत ने कुछ नहीं सुना। वह सिर्फ मटकी पर ध्यान देता रहा।
जो तुम्हारे हाथ में नहीं है उसे भगवान पर छोड़ दो।
कुछ देर बाद संत ने कहा रुको। अब बताओ रास्ते में कितने लोग मिले? भगत बोला महाराज मुझे कुछ पता नहीं। मैं तो बस मटकी बचाने पर ध्यान दे रहा था। संत ने शांत स्वर में कहा यही संत होने की शुरुआत है। जब ध्यान जरूरी चीज पर होता है तो बेकार की आवाजें अपने आप चुप हो जाती हैं। तुम्हारी चिंता इसलिए है क्योंकि तुम उन चीजों पर ध्यान दे रहे हो जो अभी हुई ही नहीं। फिर संत ने आगे कहा जो तुम्हारे हाथ में है कर्म उसे ईमानदारी से करो। जो तुम्हारे हाथ में नहीं भविष्य उसे भगवान पर छोड़ दो। यही संत का मन है।
उस दिन भगत समझ गया संत होना जंगल में जाना नहीं है। संत होना मन की अनावश्यक चिंताओं को छोड़ देना है। धीरे-धीरे भगत ने चिंता कम की। वर्तमान में जीना सीखा और वही व्यक्ति जो कभी बेचैन रहता था। अब दूसरों को शांति की सीख देने लगा।
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