समस्या पैसों की नहीं बल्कि सोच की होती है।

कभी-कभी हम सोचते हैं कि क्या सच में किसी चीज को पाने के लिए हमें बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है या फिर बस उसे जाने देना चाहिए। जो भी चीज हमारे जीवन में आने वाली है वह खुद चलकर अपने सही समय पर हमारी ओर चली आए। देखो जब हम कोई नई स्किल सीखना चाहते हैं जैसे कि संगीत बजाना, कोई वाद्य यंत्र सीखना या फिर किसी कला में निपुण होना तो हमें समय देना ही पड़ता है। हम इंस्टेंट मास्टर नहीं बन सकते लेकिन असली बात यह नहीं है कि मेहनत करनी है या नहीं करनी। असली बात यह है कि मेहनत करने से पहले अपने मन को तैयार करना कितना जरूरी है, क्योंकि हर काम, हर अचीवमेंट, हर सफलता की शुरुआत हमारे भीतर से होती है और जो व्यक्ति अपनी मानसिक तैयारी कर लेता है, उसके लिए काम सिर्फ आसान नहीं बल्कि आनंदमय हो जाता है।
जिंदगी में जो कुछ भी हमें बाहर दिखाई देता है, जो कुछ भी हमें अनुभव होता है, वह सब पहले हमारे मन में हमारे विचारों के स्तर पर जन्म लेता है। हर एक्शन, हर शब्द ,हर डिसीजन, हर सफलता। यह सब किसी एक थॉट की उपज होते हैं। अगर हम अपने विचारों को सही दिशा में प्रवाहित कर दें तो हमारी जिंदगी का फ्लो अपने आप स्मूथ हो जाता है। हमारी मेहनत सहज हो जाती है और जीवन में सब कुछ एफर्टलेसली अनफोल्ड होने लगता है।
भविष्य की सभ्यता शायद इस बात को बहुत गहराई से समझेगी कि जो कुछ भी बाहर प्रकट हो रहा है, वह भीतर के विचारों का ही प्रतिबिंब है और जो व्यक्ति आज इस सच को समझ लेता है, वह जीवन की मुश्किलों को कठिनाई नहीं बल्कि सीखने और सृजन की प्रक्रिया के रूप में देखना शुरू कर देता है।
समस्या पैसों की नहीं बल्कि सोच की होती है।
मैं तुम्हें एक ऐसी औरत की कहानी सुनाता हूं जिसने अपने भीतर की सोच को इतना बदल दिया कि उसकी पूरी हकीकत ही बदल गई और जब वो अपनी पहली फिल्म बना रही थी, तब वो कई मिलियन के भारी कर्ज में डूबी हुई थी। उसके पास ना पैसे थे, ना अस्थिरता, ना सुरक्षा। उसका घर गिरवी था, बैंक अकाउंट खाली था। हर तरफ से डर और असमंजस की स्थिति थी लेकिन उसने हार नहीं मानी।
उसने हकीकत को स्वीकारने की बजाय अपनी एनर्जी को बदलने का फैसला किया। वो हर रोज सुबह टहलने निकलती और खुद से धीरे-धीरे दोहराती। मैं हर कदम के साथ समृद्धि को अपने भीतर खींच रही हूं। पैसा मेरे चारों तरफ है और मैं उसके प्रवाह का हिस्सा हूं। उसके पास पैसों की कमी नहीं थी लेकिन उसके पास एक अनमोल चीज थी विश्वास। धीरे-धीरे उसके शब्द हकीकत में बदलने लगे। उसकी सोच उसकी जिंदगी का रूप लेने लगी क्योंकि उसने समझ लिया था कि समस्या पैसों की नहीं थी बल्कि सोच की थी।
उसने जाना कि उसके चारों तरफ की कमी सिर्फ उसके भीतर की कमी का प्रतिबिंब थी वो कहती थी मेरे जीवन में जो भी अभाव था, वह सिर्फ मेरे विचारों से निकला था। बचपन से मुझे यही सिखाया गया था कि पैसा पाना मुश्किल है। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और अमीर लोग हमेशा कुछ गलत करते हैं, लेकिन जब एक दिन मुझे यह समझ में आया कि यह सिर्फ इन्हहेरिटेड बिलीव्स हैं। तब मैंने फैसला किया कि अब मैं हर विचार को अबंडेंस की सही दिशा में मोडूंगा।
समस्या पैसों की नहीं बल्कि सोच की होती है।
मैं अपने सब कॉन्शियस को प्रोस्पेरिटी की भाषा सिखाऊंगा। उसने अपने मन को बार-बार नया संदेश देना शुरू किया। पैसा मेरे पास आसानी से आता है। ब्रह्मांड मेरे पक्ष में है और मैं अपनी रियलिटी को खुद क्रिएट कर रही हूं। वो कहती थी उस पल के बाद मुझे यह महसूस हो गया कि अब मेरी जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं रहेगी क्योंकि मैंने अपने भीतर की सबसे गहरी जड़ अपनी सोच को बदल दिया था और सच में उसके बाद सब कुछ बदल गया क्योंकि पैसा बाहर से नहीं आता।
वह हमारे भीतर की अनुमति से आता है। हम उसे अपने वाइब्रेशन से अट्रैक्ट करते हैं या रिपेल करते हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि मैं पॉजिटिव सोचता हूं फिर भी पैसा नहीं आता। यह क्या चक्कर है? लेकिन सच यह है कि अगर तुम मनी मनी बस यही सोचते रहोगे तो उसी समय भीतर कमी का एहसास कर रहे हो उस मनी का। वास्तव में तुम अबंडेंस नहीं लैक पर ध्यान दे रहे हो कि मनी नहीं है, मनी नहीं है। मीनिंग यही हुआ ना कि मनी मनी मनी चाहिए। मतलब है नहीं तभी तो चाहिए ना। तो यानी तुम्हारा फोकस कमी की तरफ है। हम अपने विचारों के साक्षी बनना भूल गए हैं। हम मानते हैं कि हम पॉजिटिव हैं। लेकिन हमारे भीतर के कई विचार, कई डर, कई संदेह ऐसे होते हैं जो हमारे खिलाफ काम कर रहे होते हैं। जब तक हम अपने मन के गवाह नहीं बनते तब तक हम यह नहीं समझ पाते हैं कि हमारे अंदर कितनी बार हम वही दोहरा रहे हैं जो हमें नहीं चाहिए।
समस्या पैसों की नहीं बल्कि सोच की होती है।
सोचो कितनी बार तुमने किसी चीज को देखकर कहा होगा मैं इसे अफोर्ड नहीं कर सकता लेकिन क्या कभी तुमने खुद से यह कहा? मुझे इंतजार है उस दिन का जब मैं इसे आसानी से ले पाऊंगा और वह दिन बहुत दूर नहीं है। यही तो फर्क है कमी और समृद्धि के विचारों में। तुम्हें अपने वॉलेट से नहीं अपने मन से खर्च करना सीखना है, क्योंकि पैसा पहले मानसिक रूप से आता है फिर भौतिक रूप में। अगर तुम्हारे विचारों में समृद्धि है तो तुम्हारी हकीकत में भी अबंडेंस प्रकट होगी। कई बार हम कहते हैं अमीर लोग तो डिसऑनेस्ट होते हैं।
अगर तुम किसी चीज को अभी अफोर्ड नहीं कर सकते तो खुद से बस यह कहो मैं उस दिन का स्वागत करता हूं जब मैं इसे खुशी और सहजता के साथ खरीद पाऊंगा और वह दिन जल्द ही आने वाला है। बस इतना कहना ही तुम्हारे वाइब्रेशन को बदल देता है। क्योंकि मैनिफेस्टेशन कभी मजबूती से नहीं आती। वह सहजता से आती है। वह तब आती है जब तुम डर को छोड़ देते हो और विश्वास के साथ हर दिन को अपनाते हो।
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