पैसा अच्छे लोगों के पास कम चतुर लोगों के पास ज्यादा होता है।

दोस्तों मनुष्य सदियों से एक भ्रम में जीता आया है कि इन्सान जितनी अधिक मेहनत करेगा उतना अधिक धन प्राप्त करेगा। यह भ्रम इतना गहरा है कि इसे प्रश्न करने का साहस भी बहुत कम लोग करते हैं। इतिहास गवाह है। सबसे अधिक पसीना बहाने वाले लोग सबसे अमीर नहीं होते। खेत में दिन रात झुककर काम करने वाला किसान महल में रहने वाले राजा से अधिक श्रम करता है फिर भी धन राजा के पास होता है।
यहां पहली सच्चाई प्रकट होती है। मेहनत और धन का संबंध सीधा नहीं है यदि केवल मेहनत से धन आता तो दुनिया का हर मजदूर सम्राट होता। हर कुली के पास खजाना होता और हर सैनिक स्वर्ण में डूबा होता पर वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। धन उस व्यक्ति के पास जाता है जो मेहनत नहीं व्यवस्था को समझता है। जो हाथों से नहीं मस्तिष्क से श्रम कराता है।
मेहनत शक्ति है पर शक्ति बिना दिशा के विनाशक होती है। मेहनत करने वाला व्यक्ति अक्सर अपने श्रम में इतना डूब जाता है कि वह यह देख ही नहीं पाता कि उसका श्रम किसके लिए फल दे रहा है। धन वहां पैदा होता है, जहां मूल्य पैदा किया जाता है और मूल्य केवल श्रम से नहीं समझ से जन्म लेता है।
एक व्यक्ति कुआं खोदता है वंही दूसरा व्यक्ति कुएं के स्थान का चुनाव करता है। पसीना पहले का बहता है। लाभ दूसरे का होता है। क्या यह अन्याय नहीं है। यह नियम है। धन कर्म का पुरस्कार नहीं है। धन बुद्धि की प्रतिक्रिया है। जो व्यक्ति केवल मेहनत करता है, वह स्वयं को बेचता है। जो व्यक्ति योजना बनाता है, वह दूसरों की मेहनत खरीदता है।
पैसा अच्छे लोगों के पास कम चतुर लोगों के पास ज्यादा होता है।
यही अंतर राजा और सेवक में होता है। सेवक सोचता है आज कितना काम करना है। राजा सोचता है किससे काम करवाना है और कब रुक जाना है। मेहनत अक्सर गरीबों को व्यस्त रखने का सबसे सफल हथियार होती है। उन्हें इतना थका दिया जाता है कि वे सोच ही ना सके। सोच खतरनाक होती है। क्योंकि सोच प्रश्न पैदा करती है। और प्रश्न व्यवस्था को हिलाते हैं। इसीलिए समाज मेहनत की पूजा करता है पर बुद्धि से डरता है।
धन वहां नहीं जाता। जहां सबसे ज्यादा श्रम हो। धन वहां जाता है जहां निर्णय लिए जाते हैं। निर्णय लेने वाला व्यक्ति गलत भी हो सकता है पर निर्णय ना लेने वाला हमेशा गरीब रहता है, जो केवल मेहनत करता है, वह समय बेचता है। और समय की कीमत सीमित होती है। जो व्यवस्था बनाता है वह समय को नियंत्रित करता है और समय पर कोई सीमा नहीं।
धन कभी भी थके हुए शरीर को नहीं चुनता। धन हमेशा तेज दिमाग को चुनता है। यह दिमाग भावुक नहीं होता। यह दया से नहीं गणना से चलता है। यही कारण है कि सबसे अधिक मेहनती लोग अक्सर सबसे अधिक भावुक होते हैं। वे कहते हैं मैंने पूरी जिंदगी खपा दी पर जीवन खपाने से राज्य नहीं बनते। राज्य बनते हैं सही चालों से। धन उस व्यक्ति को मिलता है जो जानता है कब काम करना है और कब पीछे हटना है।
जो जानता है किस युद्ध को लड़ना है और किससे दूर रहना है। हर लड़ाई जीतनी जरूरी नहीं पर हर लड़ाई में उतरना निश्चित गरीबी है। मेहनत करने वाला अक्सर गर्व करता है कि वह कितना ईमानदार है। पर क्या ईमानदारी के साथ बुद्धि भी है?
पैसा अच्छे लोगों के पास कम चतुर लोगों के पास ज्यादा होता है।
यदि कोई व्यक्ति खुले मैदान में खड़ा होकर सत्य चिल्लाता है और शत्रु तीर चला देता है तो मृत्यु सत्य की नहीं मूर्खता की होती है। धन चतुर लोगों के पास जाता है, अच्छे लोगों के पास नहीं। यह वाक्य कड़वा है पर सत्य है। अच्छाई भावना है। धन गणित है जो गणित नहीं जानता। वह भावना के सहारे जीवन नहीं चला सकता। जो व्यक्ति केवल मेहनत करता है, वह परिणाम का इंतजार करता है। जो व्यक्ति रणनीति बनाता है, वह परिणाम तय करता है। यही कारण है कि इतिहास में राजा कम थे।
सेवक अधिक गरीबी मेहनत की कमी नहीं है। गरीबी समझ की कमी है। और धन कभी पसीने को नहीं देखता। धन निर्णय को देखता है। जो व्यक्ति जीवन भर केवल मेहनत करता है। वह दूसरों के सपनों को पूरा करता है। जो व्यक्ति सोचता है, चुनता है और चाल चलता है, वह इतिहास रचता है। धन उसका अनुसरण करता है जो मार्ग बनाता है ना कि उसका जो केवल चलता रहता है।
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