शब्दों के चक्कर में रिश्तों को ख़राब मत कीजिये।

दोस्तों इंसान कठोर इतना होता है कि हर चीज झेल जाता है और नरम इतना होता है कि एक शब्द भी उसे चुभ जाता है, क्योंकि कई बार हम कुछ शब्दों के चक्कर में, कुछ बातों के चक्कर में, रिश्तों को खराब कर लेते हैं। हम सामने वाले का इमोशन समझ नहीं पाते। कई बार शब्द भी वह बात नहीं कह पाते जो भावनाएं कह जाती हैं, इसको एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
एक बड़ी छोटी सी कहानी है एक राजा की जिनकी तीन राजकुमारियां थी। उन्होंने तीनों राजकुमारियों को गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजा। गुरु मां के पास गुरु जी के पास वहां पर रहकर के उन्होंने विद्या ग्रहण की। 2 साल बाद जब वापस तीनों राजकुमारियां राजमहल में आई तो ढोल नगाड़ों के साथ भव्य स्वागत हुआ। राजा ने एक बहुत बड़ी दावत रखी। बहुत बड़ा आयोजन रखा। जब आयोजन संपन्न हुआ तो तीनों राजकुमारियां जो हैं राजमहल के जो दरबार था राज दरबार वहां पधारी।
दरबार में बड़े-बड़े मंत्री बैठे हुए थे। राजा ने महामंत्री से कहा कि महामंत्री जी आप क्या कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं जिससे पता चले कि हमारी राजकुमारियों ने कितनी विद्या ग्रहण की है। कितना कुछ उन्हें समझ में आया? कितना कुछ उन्होंने सीखा है। महामंत्री ने कहा अरे नहीं महाराज मुझे कोई शंका नहीं है।
महाराज ने फिर से कहा नहीं आपको कोई प्रश्न तो पूछना चाहिए। तो महामंत्री ने कहा ठीक है महाराज हम सब तो जानते हैं कि आप अपनी बेटियों से कितना प्रेम करते हैं, लेकिन यह बेटियां राजकुमारियां आपसे कितना प्रेम करती हैं। मैं बस यही जानना चाहता हूं। महामंत्री ने एक ही प्रश्न तीनों राजकुमारियों से पूछा।
शब्दों के चक्कर में रिश्तों को ख़राब मत कीजिये।
पहली वाली से पूछा कि बताइए आप अपने पिताजी से कितना प्रेम करती हैं? पहली राजकुमारी ने कहा कि मैं पिताजी से इतना प्रेम करती हूं जितना सूर्य धरती से करते हैं। प्रतिदिन आ जाते हैं प्रकाश फैलाते हैं। यहां सबका जीवन चलता है। सबने तालियां बजाई कि क्या बात है। दूसरी राजकुमारी से यही प्रश्न पूछा गया कि आप अपने पिताजी से कितना प्रेम करती हैं? दूसरी राजकुमारी ने कहा कि मैं महाराज से पिताजी से उतना प्रेम करती हूं जितनामहाराज प्रजा से करते हैं। फिर से तालियां बजी।
अब तीसरी राजकुमारी की बारी थी। महामंत्री ने पूछा कि आप बताइए राजकुमारी जी आप पिताजी से कितना प्रेम करती हैं? तीसरी राजकुमारी ने कहा कि मैं पिताजी से उतना प्रेम करती हूं जितना लोग भोजन में नमक से करते हैं। यह बात सुनने के बाद जो है सभा में सन्नाटा छा गया। लोगों ने सिर नीचे कर लिए। कान्हा फूंसी होने लगी। लोग धीमे-धीमे हंसने लगे कि यह क्या जवाब हुआ? महाराज भी चुप हो गए कि यह क्या हुआ?
महाराज ने महामंत्री को बुलाया और कहा सुनो तीसरी राजकुमारी को फिर से गुरुकुल भेजा जाए। आज ही जो है भेज दीजिए। आप छोड़ के आइए। इनकी विद्या में कुछ कमी रह गई। इनको थोड़ा और समय वहां बिताना चाहिए। कुछ महीने इन्हें वहां रहने देना चाहिए। आप इन्हें छोड़ के आइए। तीसरी राजकुमारी को भेजा गया। महामंत्री उनको लेकर के गए।
जब महामंत्री उनको ले जा रहे थे, छोड़ने के लिए जा रहे थे, विदा कर रहे थे तो पूछा राजकुमारी से कि राजकुमारी जी एक बात बताइए आपका उत्तर तो सबसे सुंदर था। फिर महाराज ऐसा क्यों कर रहे हैं? तो तीसरी राजकुमारी जो थी वह कहने लगी कि पिताजी की कोई गलती नहीं है। दुनिया का ही दस्तूर है।
शब्दों के चक्कर में रिश्तों को ख़राब मत कीजिये।
यहां अगर जो लोगों को पसंद नहीं है उससे हटकर कोई बात कह दो, कुछ अलग बात कह दो तो लोगों को समझ ही नहीं आती। लोग हंसी उड़ाने लगते हैं। पिताजी का कोई दोष नहीं है। महामंत्री बात समझ गए। वापस आए महामंत्री महल में और सीधे गए रसोई में। जाकर के जो हलवाई थे उनसे कहा कि सुनो आज शाम के भोजन में नमक मत डालना।
शाम में जब महाराज के सामने भोजन का थाल पहुंचा तो सब्जी में नमक नहीं था। जैसे ही महाराज ने भोजन शुरू किया, उन्होंने थाल हटा दिया कि कैसा भोजन है? नमक कहां है? और जैसे उन्होंने नमक कहां है? बोला, उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे। उन्हें समझ में आ गया कि उन्होंने अपनी ही बेटी को कितनी बड़ी सजा दे दी। तुरंत दौड़े भागे और गए गुरुकुल में लेकर आए तीसरी राजकुमारी को वापस जो है स्वागत करवाया और सबको समझाया कि मेरी बेटी ने कितना सुंदर उत्तर दिया था।
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