अगर आप रोजाना 8 घंटे सोकर भी थके रहते हैं तो प्रॉब्लम है।

अगर आप रोजाना 8 घंटे सोकर भी थके रहते हैं, तो प्रॉब्लम आपकी नींद की क्वांटिटी नहीं बल्कि नींद की क्वालिटी है, आइये जानते है इसके कुछ कारणों को :-
पहला कारण है स्क्रीन एक्सपोज़र यानी कि सोने से पहले मोबाइल चलाना। आज लगभग हर इंसान सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप या टीवी देख रहा है। लेकिन स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आपके दिमाग को एक गलत सिग्नल देती है। साइंस बताता है कि ब्लू लाइट हमारे शरीर में बनने वाले हॉर्मोन मेटोनिन को सप्रेस कर देती है। मेलिटोनिन वही हॉर्मोन है जो हमारे दिमाग को बताता है कि भैया सोने का टाइम हो गया।
जब आप रात में स्क्रीन देखेंगे, नींद आने में देर होगी, नींद हल्की हो जाएगी यानी कि आप सो तो रहे हैं लेकिन दिमाग को प्रॉपर आराम मिल नहीं पा रहा है।
दूसरा कारण है कैफीन टाइमिंग। कॉफी कब पी गई यह बहुत ज्यादा जरूरी है। बहुत लोग कहते हैं कि मुझे तो कुछ नहीं होता कॉफी से। मैं तो सो जाता हूं लेकिन असली प्रॉब्लम यह नहीं है कि आपको नींद आ रही है कि नहीं। प्रॉब्लम यह है कि कैफीन आपकी स्लीप क्वालिटी को खराब करता है। कैफीन का हाफ लाइफ लगभग 5 से 7 घंटे का होता है। मतलब अगर आपने शाम 5:00 बजे भी कॉफी पी तो रात 12:00 बजे तक भी उसका असर आपके दिमाग में रहेगा। इसका असर यह है कि डीप स्लीप जो है कम हो जाती है। आरईएम स्लीप जो है टूट जाती है और शरीर की रिकवरी अधूरी रह जाती है। इसीलिए सुबह उठने के बाद भी थकान बनी रहती है।
अगर आप रोजाना 8 घंटे सोकर भी थके रहते हैं तो प्रॉब्लम है।
तीसरा कारण है आरईएम स्लीप का डिस्ट्रक्शन। नींद पूरी हुई लेकिन सही नींद पूरी नहीं हुई। नींद सिर्फ घंटे गिनने का काम नहीं है। नींद के अलग-अलग स्टेजेस होते हैं। लाइट स्लीप, डीप स्लीप और आरएम स्लीप। आरएम स्लीप वो स्टेज है जहां दिमाग इमोशनल रिसेट करता है। मेमोरी प्रोसेस होती है और मेंटल फटीग जो है दूर होता है। अगर आपकी आरएएम स्लीप डिस्टर्ब हो जाए तो आप 8 घंटे सोने के बाद भी मेंटली एग्जॉस्टेड महसूस करेंगे। स्क्रीन एक्सपोज़र, लेट कैफीन, स्ट्रेस और इर्रेगुलर स्लीप टाइमिंग जो है यह सब आरईएम स्लीप को डैमेज करते हैं। इसीलिए लोग कहते हैं कि नींद तो पूरी कर ली लेकिन फ्रेश फील नहीं हो रहा है।
चौथा कारण है रूम टेंपरेचर जो लोग इग्नोर कर देते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि सोते समय शरीर को ठंडा होना जरूरी होता है। साइंस के हिसाब से सोने के लिए आइडल रूम टेंपरेचर लगभग 18 से 22° सेल्सियस होता है। अगर कमरा बहुत गर्म है तो शरीर बार-बार माइक्रोवेक अप्स करता है। स्लीप साइकिल टूटती है और डीप स्लीप यानी गहरी नींद कम हो जाती है। आपको लगता है कि आप पूरी रात सोते रहे लेकिन असल में दिमाग बार-बार जागता रहता है।
इसीलिए सुबह उठकर बॉडी भारी लगती है। तो असली कंक्लूजन क्या है? 8 घंटे सोना जरूरी है लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है क्वालिटी स्लीप। अगर आप चाहते हैं कि सुबह उठकर सच में फ्रेश महसूस करें तो सोने से एक से दो घंटे पहले स्क्रीन कम करें। शाम के बाद कैफीन अवॉइड करें। स्लीप टाइमिंग रेगुलर रखें और कमरे का टेंपरेचर थोड़ा कूल रखें। नींद लग्जरी नहीं है, नींद रिकवरी है और रिकवरी के बिना बॉडी और माइंड दोनों थके हुए रहते हैं।
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