प्रेमानंद जी महाराज का जीवन परिचय।

हैल्लो दोस्तों नमस्कार महाराज जी के जीवन को समझें तो समझ में आता है कि भगवान को पाना है तो सबसे पहले हमें भगवान के ऊपर पूरी तरह से समर्पित हो जाना चाहिए, यही बात भगवान श्री कृष्ण जी गीता में कह रहे हैं, सारे धर्म का त्याग कर मेरी शरण में आ जाओ पूर्ण समर्पण करो। आप अपने वह सारे काम कीजिए जो आपको सफलता की ओर ले जाएं।
कर्म करो और उसके फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ दो और ईश्वर पर भरोसा रखो ऐसा करने से आप पूरी तरह से अपने काम के प्रति समर्पित हो जाओगे। अच्छे से फोकस कर पाओगे और रिजल्ट को सोचकर कभी परेशान नहीं होंगे।
संत वही जो भक्तों के जीवन में प्रकाश भर दे जिन्हें देखकर मन शांत हो जाता है जिन्हें सुनके आपको जीवन में आने वाले तमाम संघर्षों से लड़ने की शक्ति मिल जाती है, ऐसे ही दिव्य संत हैं श्री प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज जिन्होंने ना केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं से लाखों लोगों का मार्गदर्शन किया।
उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं डॉक्टरों के अनुसार वे 20 साल पहले ही मर जाने वाले थे। उनके जीवन में कई कठिनाइयां आई। एक समय था जब उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह से खराब हो चुकी थी। उन्हें इस हालत में कई आश्रमों से निकाल दिया गया।
कड़ाके की ठंड में वे गेहूं के टाट से बनी बोरी को ओढ़कर सोते थे।
श्री प्रेमानंद महाराज जी का जन्म 1969 में उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसोल ब्लॉक के आखिरी गांव में हुआ। उनका असली नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उनका जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ अलग ही योजना बनाई थी।
प्रेमानंद जी महाराज का जीवन परिचय।
उनके पिता श्री शंभूनाथ पांडे एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और उनकी माता श्रीमती रमा देवी अत्यंत भक्ति भाव वाली महिला थी। परिवार में पहले से ही सन्यास की परंपरा थी। उनके दादाजी भी सन्यासी थे। इस कारण से बचपन से ही उनके मन में ईश्वर भक्ति के बीज अंकुरित हो गए थे।
5 साल की उम्र में वे भजन कीर्तन में रुचि रखने लगे और बहुत छोटी उम्र में ही भगवत गीता का अध्ययन करने लगे। उन्हें धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और संतों की संगति में बैठने का विशेष शौक था। वह अक्सर गांव के मंदिर में घंटों बैठकर रामायण और भगवत गीता की कथाएं सुना करते थे। उनके परिवार के लोग इस बालक की गहरी आध्यात्मिक रुचि को देखकर चकित थे। बचपन में सत्संग सुनने के दौरान वे अक्सर मन में सोचते थे कि घर के सदस्य एक ना एक दिन मर जाएंगे तो फिर मेरा इस दुनिया में कौन है? मैं किसके पास रहूंगा? मुझे किसका सहारा है?
उनके मन में प्रेरणा हुई कि मेरे तो सिर्फ भगवान हैं। इसके अलावा और कोई नहीं। इसलिए घर परिवार को छोड़कर भगवान के पास जाना ही उन्हें एकमात्र उपाय समझ में आया। जब वे नवीं कक्षा में पास हुए तब उनका मन पूर्ण रूप से यह निश्चित कर चुका था कि उनका इस संसार में ईश्वर के सिवाय और कोई नहीं है, इसलिए उन्होंने घर छोड़ने का पूरी तरह से मन बना लिया।
प्रेमानंद जी महाराज अपनीमां से सबसे ज्यादा स्नेह करते थे। इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपनी मां को यह बात बताई। उन्होंने कहा अम्मा हमारा मन करता है कि हम घर से भागकर भगवान की प्राप्ति करें और इस पर उनकी मां बोली कि भागकर थोड़े ही भगवान मिलते हैं।
प्रेमानंद जी महाराज का जीवन परिचय।
भगवान को प्राप्त करना है तो बैठकर भजन करो। इस पर प्रेमानंद बोले कि नहीं हमारा मन है कि बाबा जी बन जाए। यह बात सिर्फ आपको बता रहे हैं। लेकिन मां को लगा कि नन्हा बच्चा है। किसी संत का सत्संग सुन लिया होगा तो मन में ऐसा विचार आया होगा। इसलिए ऐसी बातें कर रहा है। ऐसा सोचकर वह घर के कार्यों में व्यस्त हो गई।
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि अगले ही दिन सुबह बजे मेरे मन में ऐसी व्याकुलता उठी कि अब बस भगवान के चरणों में ही प्राण न्योछावर करना है और मात्र 13 वर्ष की उम्र में प्रेमानंद जी महाराज जी ने घर छोड़ दिया और निकल पड़े अनंत यात्रा पर।
कहते हैं जब व्यक्ति को सच्ची आध्यात्मिक खोज होती है तो ईश्वर स्वयं उसे राह दिखाते हैं। अनिरुद्ध कुमार पांडे ने अपने घर परिवार को छोड़कर अकेले ही सन्यास मार्ग की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने आध्यात्मिक साधना में खुद को समर्पित कर दिया। इस यात्रा में वे कई संतों से मिले।
महाराज जी ने जब सन्यास में प्रवेश किया तब शुरुआत में उनकी तपोस्थली वाराणसी रही। यहां महाराज जी का नित्य प्रतिदिन का नियम था। गंगा जी में स्नान कर तुलसी घाट पर एक विशाल पीपल वृक्ष के नीचे आसन लगाकर गंगा जी और महादेव जी का ध्यान करना। इसके बाद भिखारी की लाइन में बैठकर भीख मांगना और वह भी केवल एक बार 10 से 15 मिनट के लिए।
इतने समय में किसी ने भिक्षा दी तो ठीक नहीं तो गंगाजल पीकर भगवान का ध्यान करते हुए उठकर चल दिए अपने 24 घंटे के एकांत वास के लिए इस प्रकार की दिनचर्या में प्रेमानंद जी महाराज को कई कई दिन तक बिना भोजन के ही मात्र गंगाजल पीकर रहना पड़ता और ऐसे में यदि कोई रोटी खाता दिख जाए तो महाराज जी सोचते यह कितना भाग्यशाली है जो इसे रोटी खाने को मिल रही है। अपने शुरुआती दौर में प्रेमानंद महाराज जी को पड़ा।
नित्य प्रतिदिन की तरह एक दिन महाराज जी ध्यान में बैठे हुए थे। तभी अचानक भगवान महादेव की प्रेरणा से उनके मन में विचार आया कि वृंदावन का नाम तो सुनाहै पर कभी गए नहीं। यह वृंदावन कैसा होगा? इसकी महिमा तो बहुत सुनी है।
भगवान भोलेनाथ की कृपा थी कि अचानक से महाराज जी के मन में वृंदावन के बारे में विचार आया और यह सोचते हुए वहां से उठकर चल दिए कि वह जो भी हो जैसा भी हो देखा जाएगा और जाकर नित्य प्रतिदिन की तरह भिक्षा मांगने के लिए बैठे और फिर वहां से नित्य नियमानुसार तुलसी घाट पर बैठे। तभी एक संत वहां आए और बोले भैया जी काशी में एक विश्वविद्यालय है। वहां एक बड़ा धार्मिक अनुष्ठान हो रहा है जिसमें दिन में श्री चैतन्य लीला और रात्रि में रासलीला का आयोजन होना है। चलो महात्मा हम दोनों लीला का दर्शन करने चलते हैं। प्रेमानंद महाराज जी ने कभी रासलीला तो देखी नहीं। लेकिन गांव में होने वाली रामलीला जरूर देखी थी।
इसलिए मन में सोचा कि जैसे गांव में एक रात के लिए रामलीला का मंचन होता है, वैसे ही रासलीला होती होगी क्योंकि महाराज जी का स्वभाव था हमेशा एकांत में रहना और एकांत वास करना। उन्होंने बाबा जी से कह दिया आप जाइए मुझे आवश्यकता नहीं है।
बाबा जी फिर से बोले अरे महात्मा श्री धाम वृंदावन से कलाकार आए हुए हैं और यह लीला पूरे एक महीने तक चलेगी। चलो चलकर दर्शन करते हैं। बड़ा आनंद आएगा। महाराज जी बोले आपको दर्शन करने जाना है तो जाइए। मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपने आप में मस्त हूं। आप मुझे क्यों छेड़ रहे हो? पर बाबा जी कहां रुकने वाले थे? वे फिर से बोले अरे महात्मा बस एक बार मेरी बात मान लो। सिर्फ एक बार मेरे कहने पर चलो। फिर मैं दोबारा नहीं कहूंगा। महाराज जी ने सोचा कि यह बाबा जी इतना हर्ट क्यों कर रहा है?
शायद इसमें महादेव जी की कोई इच्छा होगी। ऐसा सोचकर और बाबा जी की बात रखने के लिए महाराज जी उन बाबा जी के साथ रास लीला देखने चले गए क्योंकि दिन का समय था और चैतन्य लीला का मंचन हो रहा था।
महाराज जी ने लीला देखी तो बड़ा आनंद आया। श्री चैतन्य लीला देखकर महाराज जी को इतना आनंद आया कि शाम को बाबा जी को कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी और रासलीला के प्रारंभ होने से पहले ही महाराज जी वहां लीला देखने पहुंच गए।
श्री चैतन्य लीला और रासलीला में महाराज जी इतने प्रभावित हुए कि एक महीने तक उनका यही नियम बन गया। इस आनंद में कब एक महीना बीत गया पता ही नहीं चला। जैसे ही लीला का समापन हुआ तब महाराज जी को ज्ञात हुआ कि लीला तो समाप्त हो गई और सारे कलाकार वृंदावन वापस जा रहे हैं। अब मेरा क्या होगा?
यह सोचकर महाराज जी के मन में हाहाकार मच गया कि अब मैं क्या करूंगा? मेरा क्या होगा? अब मैं जिऊंगा कैसे? मुझे तो अब वृंदावन जाना है। महाराज जी रोने लगे। यह सब कलाकार वापस वृंदावन जा रहे हैं। तो वृंदावन में भी यह ऐसे ही लीला का आयोजन करते होंगे। अगर मैं इनके साथ चला जाऊं तो मुझे रोज लीला देखने को मिलती रहेगी।
इसके बदले में मैं इनकी सेवा करता रहूंगा। मन में ऐसा भाव लेकर महाराज जी टीम संचालक के पास पहुंचे और दंडवत करके अपने मन के भाव उनके सामने प्रकट किए कि स्वामी जी हम गरीब बाबा हैं। हमारे पास पैसे तो हैं नहीं। मैं आपकी सेवा करूंगा।
मुझे अपने पास रख लो। संचालक महोदय बड़े ही विनम्र भाव से बोले, अरे नहीं बाबा ऐसा तो संभव ही नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है? तब महाराज जी बोले कि स्वामी जी हम सिर्फ
रास लीला देखना चाहते हैं और कुछ नहीं। तब संचालक महोदय फिर से बोले बाबा तू एक बार वृंदावन आजा। बिहारी जी तुझे छोड़ेंगे नहीं। श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि इस वाक्य ने मेरा जीवन बदल कर रख दिया। मैं इस वाक्य को गुरु मंत्र मानता हूं और उन संचालक महोदय को अपना गुरु। इसके बाद तो महाराज जी के मन में एक ही लगन लग गई कि मुझे वृंदावन जाना है। मुझे वृंदावन जाना है। वे समझ चुके थे कि उनकी आत्मा का असली घर वृंदावन ही है।
जहां श्री कृष्ण और राधा रानी का प्रेम रस सदा प्रवाहित होता है। दर्शकों यह होती है भगवान की कृपा कि कल तक जो महाराज जी अपने नित्य नियमानुसार भगवान का ध्यान करते हुए अपने भजन और एकांत वास में मस्त रहते थे। आज वह वृंदावन जाने के लिए पागलों की तरह हट लगाए बैठे हैं। भगवान की कृपा को आप इस तरह से अनुभव कीजिए कि पहले अचानक ही मन में प्रेरणा आना कि कैसा होगा वृंदावन। फिर उसी समय अचानक से रास लीला का आयोजन होना।
उसकी सूचना किसी अपरिचित बाबा के द्वारा महाराज जी को देना और उन्हें हठ पूर्वक लीला देखने के लिए ले जाना और इसके बाद महाराज जी के मन में प्रेरणा होना कि मुझे वृंदावन जाना है। यह कृपा नहीं तो और क्या है? एक माह की लीला का दर्शन करने के बाद महाराज जी फिर से पुनः अपने नियमानुसार गंगा जी में स्नान कर तुलसी घाट पर बैठकर ध्यान करने लगे और भिक्षा के लिए बैठकर एकांत वास के लिए निकल जाने वाला उनका नियम फिर से शुरू हो गया। लेकिन इस दिनचर्या में एक नई बात जुड़ गई। वो यह थी कि मुझे वृंदावन जाना है।
मुझे बस कैसे भी वृंदावन जाना है। यह कार्य कुछ दिन तक ही चला। एक दिन महाराज जी प्रातः काल तुलसी घाट पर ध्यान में बैठे हुए थे कि पास में ही स्थित संकट मोचन हनुमान जी मंदिर के बाबा युगल किशोर जी प्रसाद लेकर वहां आए और बोले कि लो बाबा प्रसाद लो।
अब महाराज जी ठहरे एकांत वासी उनका किसी से कोई परिचय नहीं था और ऐसे में कोई अचानक आपको कुछ खाने को दे यह उन्होंने उचित नहीं समझा। इसलिए महाराज जी बोले क्यों ले लो यह मुझे ही क्यों दे रहे हो? इतने सारेलोग हैं किसी को भी दे दो। युगल किशोर जीबोले बाबा अंदर से प्रेरणा हुई है। यहप्रसाद आप ही को देना है। संकट मोचन काप्रसाद है ले लीजिए।
जब महाराज जी को उनकेव्यवहार से प्रतीत हुआ कि इनसे कोई खतरानहीं है। कोई स्वार्थ नहीं है। तब महाराजजी ने वह प्रसाद स्वीकार कर लिया। प्रसादपाया और कमंडल से गंगाजल पिया। उसके बादबाबा युगल किशोर जी बोले बाबा चलो मेरीकुटिया में चलो।
महाराज जी बोले नहीं यहमेरा नियम है कि मैं किसी गृहस्थ केदरवाजे नहीं जाता और ना ही उनके घर मेंप्रवेश करता हूं। बस यहीं खुलेआसमान केनीचे रहता हूं और भजन करता हूं। जो भिक्षामिल जाती है वही पा लेता हूं। तब युगलकिशोर जी बोले बाबा मैं गृहस्थ नहीं हूं।मैं भी बाबा जी हूं। उनके इतने प्यार सेबोलने पर महाराज जी उनकी कुटिया में चलेगए। जहां युगल किशोर जी ने अपने हाथ सेदाल रोटी बनाकर महाराज जी को खिलाया। इससेमहाराज जी की भूख तो शांत हो गई लेकिन उसभूख का क्या जो उनके मन में लगी थी
चाहेकैसी भी परिस्थितियों क्यों ना हो महाराजजी के मन में एक बात हमेशा खटकती रहती थीमुझे वृंदावन जाना है मैं वृंदावन कैसेजाऊंगा क्योंकि युगल किशोर जी उन्हें भलेमनुष्य प्रतीत हो रहे थे इसलिए उनसे रहानहीं गया वे तुरंत कह उठे क्या आप मुझेवृंदावन पहुंचा सकते हैं अब यहां तो भगवानकी लीला ही है मानो युगल किशोर जी इसप्रश्न के लिए पहले ही तैयार बैठे थे।प्रश्न सुनते ही झट से बोले हां हां बाबाजरूर पहुंचा सकता हूं। बताइए आपको कब जानाहै?
महाराज जी बोले हम तो तैयार ही बैठेहैं। जब आप व्यवस्था कर दो तब चले जाएंगे।युगल किशोर जी बोले ठीक है बाबा आप कल कीतैयारी कर लीजिए। कल ही आपको वृंदावन लेचलूंगा। इतना सुनते ही महाराज जी के आनंदका ठिकाना नहीं रहा। उनका रूम रूमरोमांचित हो उठा। मन प्रसन्न हो गया। कलवृंदावन जाना है। आखिर कल वृंदावन जानाहै।
उस समय कोई डायरेक्ट ट्रेन बनारस सेमथुरा के लिए नहीं जाती थी। तो महाराज जीयुगल किशोर जी के साथ चित्रकूट आ गए। जहांदोनों तीन-चार दिन रहे। फिर चित्रकूट सेयुगल किशोर जी ने महाराज जी को मथुरा जानेवाली रेलगाड़ी में बैठा दिया।
अब देखोरेलगाड़ी में मथुरा की यात्रा के दौरान दोलोगों से महाराज जी का परिचय हुआ। जोमहाराज जी के विचारों से बहुत प्रभावितहुए और वह महाराज जी को कुछ रुपए देने लगेक्योंकि महाराज जी के पास एक रुपए भी नहीं था पर फिर भी उन्होंने रुपए लेने से इंकारकर दिया क्योंकि वे जानते थे जिस मालिक ने जन्म दिया है अन्न वस्त्र भी वही देगा सरढगने के लिए छत देगा तब वे दोनों लोगमहाराज जी से बोले आप हमारे साथ चलो हमजहां ठहरे हैं आज रात आप भी वहीं विश्रामकरके कल वृंदावन चले जाना महाराज जी ठहरेस्वभाव के सरल दुनियादारी के मतलब ना रखनेवाले।
तो वे तुरंत मान गए और बोले ठीक हैभैया आज तुम्हारे साथ रुक जाता हूं। कलमुझे वृंदावन पहुंचा देना। मथुरा मेंराधेश्याम गेस्ट हाउस के बाहर महाराज जीको बिठाकर वे लोग बोले हम अंदर जा रहेहैं। थोड़ी देर में आपको बुलाएंगे। रात कासमय था और ठंड का मौसम था।
महाराज जीगेस्ट हाउस के बाहर बैठकर अपने बुलावे काइंतजार करने लगे। लेकिन बहुत समय बीत गया।कोई बुलाने नहीं आया। कुछ देर बाद मथुरासे वृंदावन चले जाएंगे। इन्हीं विचारोंमें खोए हुए प्रेमानंद जी महाराज गेस्टहाउस के बाहर बैठे हुए थे। उस समय रात्रिके 11:00 बजे के आसपास का समय हो रहा था।तभी एक सज्जन वहां आए और बोले बाबा जयश्री राधे कृष्णा कैसे बैठे हो अकेले इतनीरात को?
महाराज जी ने सारी कहानी उन सज्जनको बताई। वे सज्जन महाराज जी को अपने घरले गए। उन्हें भरपेट स्वादिष्ट भोजन करायाऔर रात्रि को विश्राम कराया। अगले दिनसुबह होते ही महाराज जी सबसे पहले पहुंचेयमुना जी।
एकादशी का दिन था। यमुना जी में स्नान करके सीधा पहुंच गए द्वारकाधीश जीके दर्शन करने। जैसे ही दर्शन किया आंखोंकी पुतलियां ठहर गई। मानो जीवन का सारासार मिल गया हो। मंजिल मिल गई हो। इसप्रकार का भाव मन में आया तो महाराज जीजोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगे। मनमें ऐसे भाव उठने लगे कि अब तक का जीवनव्यर्थ चला गया।
पूरा जीवन भागदौड़ मेंव्यतीत हो गया। आखिर मंजिल तो यही है।उन्हें इस बात का जरा भी ख्याल नहीं कि वेकहां खड़े हैं, क्या कर रहे हैं। उन्हेंकौन-कौन देख रहा है, बस रोए जा रहे हैं।मंदिर में आए अन्य लोग आश्चर्यचकित हो गएयह दृश्य देखकर। पूरा मंदिर वात्सल्य सेघिर गया। लोग आपस में चर्चा करने लगे। अरेबाबा जी को देखो कैसे भगवान की याद में रोरहे हैं और देखते ही देखते कुछ ही क्षणोंमें महाराज जी के चारों तरफ दर्शनार्थियोंकी भीड़ जमा हो गई।
कोई उन्हें फूल मालापहना रहा था तो कोई उनके चरणों में गिररहा था। तभी एक दर्शनार्थी बोला बाबा मैंआपकी सेवा करना चाहता हूं। आप आदेश करें।महाराज जी के मन में तो बस एक ही इच्छाथी। मुझे वृंदावन जाना है। कैसे भी मुझेवृंदावन पहुंचा दो। उस भक्त ने साधन कीव्यवस्था करके महाराज जी को मथुरा से विदाकिया। गाड़ी वाले ने महाराज जी को वृंदावनके रमण रीति तराहे पर उतार दिया।
प्रेमानंद महाराज जी इसे अपना सौभाग्यमानते हैं कि मेरा वृंदावन में प्रवेश हुआतो एकादशी के दिन यहां रमण रीति परिक्रमामार्ग में बहुत भक्त परिक्रमा कर रहे थे।महाराज जी के लिए यह सबकुछ नया था। इतनीसारी भीड़ को एक साथ परिक्रमा करते देखउन्होंने सोचा कि वृंदावन में ऐसा ही होताहोगा। लेकिन ईश्वर के द्वारा तो यह पहलेही तय किया जा चुका था कि महाराज जी सेकिसकी, कब और किस स्थान पर भेंट टोनी थी।अब इसे विधि का विधान कहें या नियति। कुछदेर रमण रीति घूमने के बाद महाराज जी कीभेंट संत श्री श्याम सखा जी से हुई।महाराज जी ने उनसे निवेदन किया कि मैंबनारस से आया हूं। बिहारी जी के दर्शनकरना चाहता हूं।
यदि तीन-चार दिन रहने कीव्यवस्था हो जाए तो आपकी बड़ी कृपा होगी।इस प्रकार महाराज जी ने वृंदावन वास औरबृजमंडल दर्शन का खूब आनंद लिया। परंतुमहाराज जी का स्वभाव था एकांत वास करना।इसलिए यहां भीड़भाड़ वाले क्रियाकलापों सेउन्हें ऐसा आभास हुआ कि उनका एकांतप्रभावित हो रहा है। इसलिए महाराज जी पुनःबनारस लौट गए। परंतु मथुरा से बनारस की जोयात्रा थी उसमें महाराज जी को एक अनोखीबेचैनी महसूस हुई।
उन्हें लगा शायद यात्राकी थकान के कारण यह बेचैनी हो रही है। कुछदिनों बनारस में रहे और अपने वही पुरानेनियमानुसार गंगा स्नान, तुलसी घाट, भिक्षाऔर एकांत वास करते रहे। लेकिन यह बेचैनीसमाप्त नहीं हो रही थी क्योंकि यह बेचैनीतो श्री धाम वृंदावन से छूट जाने से पैदाहो रही थी तो कैसे खत्म होती जब तकवृंदावन का वास ना मिल जाए खैर महाराज जीइस बात को जल्दी ही समझ गए और बिना देरकिए वृंदावन में वहीं रमण रीति आश्रम मेंआ गए तब कहीं जाकर बेचैनी समाप्त हुई तबसे लेकर आज तक प्रेमानंद जी महाराजवृंदावन में रहकर अपनी लाडली जी की सेवाकर रहे हैं। इस दौरान महाराज जी वृंदावनमें कई आश्रमों में रहे।
वृंदावनमें उनकानित्य प्रतिदिन का नियम था वृंदावन कीपरिक्रमा करना और बांके बिहारी जी केदर्शन करना। एक दिन महाराज जी परिक्रमा कररहे थे जहां पर एक सखी एक पद का गायन कररही थी जिसकी तरफ महाराज जी का अनायास हीध्यान चला गया और बड़े ध्यानपूक उस सखी केभावों को सुनने लगे। गायन पूर्ण होने केबाद उस सखी से निवेदन किया कि मुझे इसकाअर्थ समझाइए। सखी बोली अगर आप इस भाव कोसमझना चाहते हैं तो इसके लिए आपको श्रीराधावल्लभ संप्रदाय से जुड़ना चाहिए। इसकेबाद महाराज जी श्री राधावल्लभ मंदिर पहुंचगए।
वहां श्री मोहित गोस्वामी जी जोमहाराज जी के गुरु थे जिन्होंने महाराज जीको बड़े ही स्नेह पूर्वक मंत्रों के साथश्री राधावल्लभ संप्रदाय की दीक्षा दी।कुछ समय पश्चात पूज्य श्री गोस्वामी जी केमार्गदर्शन में महाराज जी को अपने वर्तमानगुरु श्री हित गोविंद शरण जी महाराज कासानिध्य प्राप्त हुआ। श्री हित गोविंद शरणजी महाराज सहचारी भाव में रहने वालेप्रमुख संतों में से एक हैं। जिन्होंनेप्रेमानंद जी महाराज जी को पूर्ण सहचारीभाव में नित्य विहार रस में दीक्षा दी।ऐसे दिव्य संतों के आशीर्वाद और वृंदावनधाम की अपार महिमा के कारण महाराज जीजल्दी ही श्री बिहारी जी और राधा रानी केश्री चरणों में अटूट श्रद्धा विकसित करतेहुए सहचारी भाव में लीन रहने लगे और हम सबभक्तों को अपनी वाणी से लाडली जी की कृपाप्रसाद का पान करा रहे हैं। महाराज जी केजीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए।
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं जब मेरी आयुवर्ष के लगभग हुई तो उस समय तक मेरेपेट में बहुत ज्यादा पीड़ा बढ़ गई थी। जिसकारण मैं रामकृष्ण मिशन में जांच करानेगया तो मुझे डॉक्टरों ने बताया कितुम्हारी आधे से ज्यादा किडनी खराब होचुकी हैं। तुम्हें पॉलीसिस्टिक किडनीडिसीज नाम का रोग है। इस बीमारी में किडनीपे हजारों की संख्या में गांठे बन जातीहैं।
कभी-कभी किडनी फटने का भी खतरा रहताहै। किडनी का यह रोग जींस में होता है।यानी माता-पिता से बच्चों में आता है। औरकुछ ही सालों में किडनी पूरी तरह से खराबहो जाती है। तुम्हारे पास ज्यादा सेज्यादा 4 से 5 साल का वक्त है। इससे अधिकनहीं। इसके बाद तुम मर जाओगे। मेरी ऐसीदशा हुआ करती थी कि मैं वही खा सकता था जोमांग कर लाता था। यदि किसी दिन भिक्षानहीं मिलती तो कुटिया में भूखे पड़े रहते।
मैं ज्यादा पढ़ा लिखा तो था नहीं। तो लगाकि दोनों किडनी खराब मतलब कभी भी मर सकतेहैं। तो रोज राधा वल्लभ जी की छवि कोप्रसादी चुनरी से अपनी छाती से बांधकरसोते। रज लगाते चरणामृत पीते। कोई देनेवाला तो था नहीं। पता नहीं रात में मर जाएतो लेकिन प्रिया लाल की कृपा ऐसी हुई किआज भी जिंदा हैं। सब लाडली जी का विधानहै।
मेरी औकात ही क्या थी कि मेरे पासरोटी भी नहीं हुआ करती थी। कोई पूछने वालानहीं होता अगर श्री जी ने यह व्यवस्था नाकी होती। आज सब कुछ उन्हीं की कृपा से है।आज महाराज जी के हजारों भक्त हैं जोउन्हें किडनी देने के लिए तैयार हैं।
लेकिन महाराज जी का कहना है कि मुझे किसीकी भी किडनी की आवश्यकता नहीं है। शरीरजितने दिन चलना होता है चलता है। मैं यहबर्दाश्त नहीं कर सकता कि दूसरे के शरीरको कष्ट देकर उसका पेट काटकर किडनी निकालीजाए और मेरे शरीर में लगे। मैं अपने सुखके लिए दूसरे के शरीर को कष्ट नहीं देसकता। इससे अच्छा है कि मैं मर जाऊं। मेराजीवन इस समाज के कल्याण और सुख के लिए है।फिर मैं ऐसे कैसे कर सकता हूं? क्योंकि आजमैं अपने आप पर असहाय हूं। आज मैं जो कुछभी हूं श्री जी के बल पर हूं। जिस इंसानकी किडनी फेल हो क्या वह साधना कर सकताहै? पर रोज भजन और सत्संग हो रहे हैं। सबश्री जी करवा रहे हैं।
मैं तो सामर्थ्यहीनहूं। मेरे पूरे शरीर में 24 घंटे दर्दरहता है। पर मेरा चेहरा कभी उदास नहींदिखता। मैं हमेशा मुस्कुराता रहता हूं। जबतक मैं अपने पर सोचता था, मांगने जानापड़ता था। लेकिन जब मैंने अपने प्राणसमर्पित कर दिए, तब से भगवान सारीव्यवस्थाएं कर रहे हैं।
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